Saturday, April 27, 2019

दाम्पत्य तत्त्व (Dampatya tatva)

लेखक – डामोहन राघवन;
हिन्दी अनुवाद – पूजा धवन



आधुनिक विचार धारा में अक्सर विवाह एक सामाजिक समझौता माना जाता है । इस समझौते के उल्लंघन को लेकर हाल ही मेंसांविधानिक  तौर पर चर्चा और विवाद भी  हुआ । क्या यह एक अपराध  है? इसका कैसे न्याय किया जाए ? यह कुछ मुद्दे उठ खडे होते हैं ।  पर यहां हम उपर्युक्त विषयों को लेकर चर्चा नहीं करने जा रहे हैं, परन्तु इसके पीछे ऋषि-मुनियों का दाम्पत्य-तत्त्वचिन्तन को  प्रस्तुतकरने जा रहे हैं ।  और हमें सम्पूर्ण विश्वास है कि इस आर्ष तत्त्व को यदि हम अपनाएंगे तब समाज में सुख शान्ति सुव्यवस्थित हो जायेगी ।

हमारी संस्कृति में विवाह एक सौदा नहीं है परन्तु एक प्राकृतिक बन्धन है । विवाह के समय में जिस मन्त्र का उच्चारण होता है वह मन्त्रइस दाम्पत्य बन्धन को दिवि और भुवि तथा शब्द और अर्थ के बीच के सम्बन्ध की उपमा कराता है । दिवि की काली घटाए धरती परनिरन्तर बरस्ते हुए, वहां के बीजों को अंकुरित कर देती हैं और दिवि का सूर्य अपनी रौशनी तथा गर्मी से पृथ्वी पर रहे जीवों को सुजीवितकर देता है । पर किसके लाभ के लिये यह सब हो रहा है - दिवि या भुवि ? देखा जाये तो दोनों के लाभ के लिये नहीं क्योंकि यह दोनोंकेवल प्रकृति की परम नियम के पालन पोषन में नियुक्त हैं । इन दोनों का यह उद्देश्य है कि इस पृथ्वी पर वर्षा और रौशनी अबाधित होऔर प्रकृतिक नियम के अनुसार समस्त जीवों को अपना जीवन चलाने में सहायक हो । 

वाक और अर्थ भी दिवि - भुवि जैसे ही मनुष्य के व्यवहार को उपस्थित रूप में रख लेते हैं । वाक उसके अर्थ द्वारा (वागर्थ) मन में जोविचार है उसको व्यक्त कर व्यवहार को सुव्यवस्थित रूप में रख लेती है । इसी प्रकार से, विवाह केवल हमारे इन्द्रियों को तृप्त करने केलिये दिये जाने वाली अनुमति नहीं है । यह दम्पतियों पर सौंपा गया एक दायित्व है | उन्से यह अपेक्षा  है कि वे लक्ष्मी और नारायण अथवापार्वति परमेश्वर नामक दिव्य दम्पतियों के संकल्प को आगे बढा एंगे । और गौर से देखा जाये तो यह दिव्य दम्पतिया, सृष्टि की मूल द्वन्द्वशक्तियाँ हैं, जो  प्रकृति और पुरुष के नाम से जाने जाते हैं ।  पति पत्नी का सम्बन्ध अथवा दाम्पत्य एक यज्ञ है;  इसके अन्तर्गत  'धर्मेच अर्थेच कामेच नातिचरामि' अर्थात ’धर्म’ में ’अर्थ’ अर्थात धन इत्यादि ’कामना’ पूर्ण करने में साथ साथ चलेंगे एक दूसरे को छोडकर नहीं चलेंगे ऐसी शपथ अग्नि के सम्मुख लेते हैं |  इस यज्ञ का फल समस्त आत्मगुणयुक्त अविछिन्न सन्तति ही है ।बहुत लोग कहते हैं यह रसमय विवाह सम्बन्ध भारतीय दृष्टी में यज्ञादि भरपूर तत्त्वों से नीरस हो गया है । परन्तु यह भी प्रस्तुत है कि विवाहसे जुडे वेद मन्त्र कहते हैं कि ‘जो तेरा हृदय है वह मेरा हृदय हो जाये और जो मेरा हृदय है वह तेरा हृदय हो जाये’ । पुराण इत्यादि साहित्यमें हमें कई उदाहरण मिलते हैं | अपनी प्रियतमा तथा होने वाली पत्नी प्रमद्वरा जब एक सर्प के विष से प्राण त्याग देती है तब अपनी आयु मेंअर्ध भाग उसको दान देकर जीवित करने वाला रुरु भी एक ऋषिकुमार ही था । महातपस्वी तथा माहाज्ञानी कर्दमप्रजापति अपनी पत्नीदेवहूति के साथ योगिश्रेष्ठ कपिलमुनि के जन्म के पूर्व एक सौ से अधिक साल तक रमी अरण्यों  में रम रहे थे । तथा पुराण-काव्यों  में वर्णितवशिष्ठ-अरुन्धति, दुष्यन्त-शकुन्तला   का प्रेम प्रसंग अत्यन्त रमणीय है| शिव पार्वती का रसमय गृहस्थ जीवन सबके लिये अत्यन्त आदर्शमयहै । विवाह संस्कार में अपने पातिव्रत्य से सितारा बनी अरुन्धति को आदर्श मानकर  नव दम्पतियों को अरुन्धति नक्षत्र का दर्शन कराते हैं ।

दाम्पत्य-जीवन सृष्टि-सृष्टीश्वर के संकल्पानुरूप् यज्ञ होता  है |  इसलिये इस यज्ञ रूप जीवन में पति अथवा पत्नी से होने वाली गलतियों का  न्याय भी प्रकृति माता के न्यायालय मे ही होता है | दण्ड का वास्तविक अर्थ होता है संयम | दण्ड शब्द का संकेत हमारे शरीर के पृष्ठवंश याने रीड की हड्डि से है | यही स्थान योग मे प्रचलित सुषुम्ना नाडी की स्थान है | ऋषि-मुनियों के हाथ मे ब्रह्मदण्ड भी इसी का संकेत होता है | कुछ भारतीय भाषाओं मे दण्ड के लिया शिक्षा शब्द का प्रयोग प्रचलित भी  है - जैसे  की कन्नड मे | शिक्षा क मूल अर्थ 'विद्या प्रदान' है | इसलिये दण्ड का मतलब सुशिक्षित करने से है ना कि मारने पीटने से | अहल्या को दण्ड स्वरूप क्या मिला ? एकान्त और दीर्घ काल की  कठोर तपस्या; और तत् फलस्वरूप प्रभु श्रीराम के पावन दर्शन !! उनका खोया हुआ संयम फिर प्राप्त होने पर वे अपने पूर्व रूप , तेज और वर्चस से पूर्ण होकर अपने पति गौतम् मुनि से एक हो गयीं | यहां और एक गौर करने लायक विषय है कि अहल्या के साथ इन्द्र को भी किये का फल भुगत्ना पडा | दण्ड स्वरूप षण्डत्व इन्द्र को प्राप्त हुआ | पात्रानुसार दोनों के दण्ड अलग अलग थे , किन्तु ध्येय तो एक ही - संयम की पुनः प्राप्ति |  यहां पर ना कोर्ट - काराग्रह का उल्लॆख है | ना हि विवाह पन्जीकरण या रद्दीकरण का |    

भारतीय संस्कृति में दाम्पत्य के बंधन मजबूत और सदृढ हैं। वे उतने ही गहरे और सूक्ष्म भी हैं।  पद्मावती देवी कवि जयदेव की पत्नी थीं | ऐसा कहा जाता है कि जब उन्होंने अपने पति की मृत्यु की झूठी खबर सुनी तो उनका दिल टूट गया और उनका निधन तत्क्षण् ही होगया। बाद में उसे प्रभु की प्रशंसा में जयदेव के गीतों के मधुर स्वरों के साथ जीवन में वापस लाया गया। ऐसी अतिरंजित आत्माओं को हमक्या कहें ? रोमांटिक युगल या उच्चतम आदर्श के भक्त-दम्पती ?  भारतवर्ष की संतानों ने  इंद्रिय संतुष्टि (इंद्रियों की भोग)और कठोर तपस्या (इंद्रियों की संयम) - इन द्वन्द्वो को एक साथ सिद्ध किया यह  भरतियों की सबसे आश्चर्यजनक और अद्वितीयउपलब्धियों में से एक के रूप में गिना जाएगा।

सर्वे जना: सुखिनो भवन्तु ।

Note: The Kannada version of this article can be viewed at AYVM blogs