Sunday, 21 April 2019

मेरा देश है भुवनत्रय (Mera desh bhuvanatray)

मूल लेखन: सुब्रह्मण्य सोमयाजी 
हिन्दी अनुवाद: श्रीमती  इन्दिरा  एम्.हेच 




कौन सा है आपका देश? भारतियों का  भारत, इंग्लंडवालों का इंग्लैण्ड, अमेरिकावालों का अमेरिका,जापानियों का जपान | इसमें विशेषता क्या है ? सामान्य तौर से जो भूमि हमारे जन्म एवं  विकास के लिए कारण बनी वह भूमि ही हमारा देश है | स्वदेश वह  हैं  जहाँ हमारा जीवन   व्यतीत  हुआ हो  | हम जिसमे बसे हैं वह भूमि | अपने देश के प्रति निष्ठा, प्रीति सभी देशवासियों में रहना स्वाभाविक है | 

मगर हमारी शीर्षिका  कहती  है ' भुवनत्रय ही मेरा देश है '| 'स्वदेशो भुवनत्रयं'| यह वाक्य इस देश के महर्षियों की बोली है | सिर्फ हमारे रहनेवाले भौगोलिक प्रदेश मात्र ही नहीं, तीनों लोक हमारा देश कहलाता है | यह कैसे संभव हो सकता है ? यह  सिर्फ हृदयविशालता का प्रदर्शन  मात्र है क्या ? अथवा बढ़ा चढ़ाकर किया गया एक दावा  है क्या ? क्या इस बात के पीछे कोई सार है ? इसका विवेचन इधर अवश्यक  है|  

यहाँ ‘ स्व’ माने हम पर शासन करनेवाले जीवशक्ति है| हमें जीवितरहने के लिए, बातचीन करने के लिए, उतना ही क्या हमें उच्वास-निश्वास के लिए भी हमारे पीछे रहे जीवशक्ति  का अवलम्बन चाहिए | हमारा   अस्तित्व   जीव के रहने पर निर्भर है| महर्षियों  के आनुभविक ज्ञान की तरह इस चेतन की व्याप्ति तीनों लोकों तक व्याप्त है| वे तीन  लोक कौन से है? बाहर दिखनेवाले स्थूल 'भूः' इस स्थूललोक की आसरा  पृष्ठभूमि  में विराजमान  सूक्ष्मलोक "भुवः'’ |  यह  देवों का  साम्राज्य है | उसका  भी आधार है सर्वमूल  परब्रह्मलोक  ‘परा’- 'सुवः'|  जब जीवशक्ति तपस्या से इन तीनो लोकों तक व्याप्त होने की क्षमता पालेति है, तब उस उन्नत स्थीति से ‘’स्वदेशो  भुवनत्रयं" जैसे सत्ययुक्त उद्गार निकलते हैं |    
  
ऐसे तीनो लोकों में संचार करके अंतरनुभव [पूर्ण ] महर्षियों  ने सिर्फ अपने भौतिक भू भागो  को  स्वदेश नही माना | इन लौकिक भूभागों के जो आधार है, वासस्थान है, उस परब्रह्मवस्तु जिन देशों में व्यक्त है उन सभी देशो को भी स्वदेश ही माना है |  तीनों लोकों तक व्याप्त जीवन है उनका |  इसीलिए ‘स्वदेशो भुवनत्रयं’’ एक अनुभवसिद्ध बात है |   

सिर्फ इन्द्रियक्षेत्रो में ही रहनेवाले हमें इंद्रियों के भी पीछे रहकर  चैतन्य देनेवाले अतीन्द्रियक्षेत्र का, सूक्ष्म और परा दृष्टियों का ज्ञान नहीं है | इसीलिए हम एक परिमित क्षेत्र को ही हमारा देश समझते है| लेकिन सर्वव्यापी परमात्मा के सुख में रहनेवाले महर्षिलोगो के लिये अपरिमित क्षेत्र को ही अपना देश कहना सहज है| वैसे अंतरनुभव से जुडी हुई बात है ‘ स्वदेशो भुवनत्रयं' | यह सिर्फ भावनात्मक बात नहीं| यह अनुभव से आनंदित होनेवाले की वास्तविक घोषणा है |  इसी को पुष्ट करनेवाले एक सुभाषित है- 
       ‘’ अयं निजः पारो वेति  गणना लघुचेतसां | 
          उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बककं ||”

इसका अर्थ है कि “यह मेरा है,’’ यह औरों का है’’ यह संकुचित मनोभाव रखनेवालों की आलोचना है| मगर सभी जीव-जंतुवो  में सर्वमूल भगवान को ही देखनेवाले उदारचरितों  के  लिए सारा विश्व अपना एक कुटुम्ब जैसे प्रतीत होना  स्वाभाविक ही  है | 

सारे जगत को इस उदारभावना से देखने के लिए सर्वव्यापी परमसत्य का अनुभव होना अवश्यक है | वैसे अनुभव को ही जीवन का परम लक्ष्य मानकर जीवकोटियों के जेवनो को  आनंदभरित  करने हेतु मन, घर, देश अतः सारे राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधकर आगे चलनेवाली भूमि है हमारा भारत | ऐसे अंतरंग  की अनुभूति से व्याप्त जीवनदर्शन है ‘ स्वदेशो भुवनत्रयं’ | 


Note: The Kannada version of this article can be viewed at AYVM blogs 



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