Tuesday, 23 July 2019

अहिंसा परमो धर्मः (Ahimsa paramo dharma:)

लेखक : बी.जी. अनंत 
हिन्दी अनुवाद : अर्चना वागीश 



भारतीय शास्त्रों का यह कहना हैं – “मा हिंस्यात् सर्व भूतानि” यानि- किसी जीव या जंतु पर हिंसा मत करना | हिंसा का मतलब है मुसीबत |  हिंसा  छोटी स्तर की दैहिक या मानसिक घासी पहूँचाने  से लेकर  प्राणघातक तक कुछ भी हॊ सक्ता हैं ।  इसी प्रकार, अगर हम किसी को भी चोट पहुंचाए बिना जीवन व्यतीत करें तोह इस तरह जीने के  विधान को “अहिंसा” कहा जाता है | भारतीय महर्षियों के अनुसार, अहिंसा  आत्मगुणों में श्रेष्ठ माना जाता है | अहिंसा न केवल मनुष्यों या जानवरों और पक्षियों से सम्बंधित है, बल्कि, जड़ सामान जो पेड़, पौधे, लताएं, पत्थर, लकड़ियां और मिटटी पर भी लागू है | क्यों के भारतीय दर्शन के अनुसार- यह सब भी जीव हैं | इस मोड़ पे एक प्रश्न उठता  है के हम कैसे जीवन व्यतीत करें ? क्यों के एक प्रसिद्द कहावत है-“जीवो जीवस्य जीवनम्”| यानि - जीव दूसरे जीव का उपयोग करके जीते हैं | ऐसे कहने पर, क्या यह सम्भव है कि हम सौ प्रतिशत किसी को चोट पहुंचाए बिना अहिंसक जीवन व्यतीत कर सकें? इस प्रश्न के बारे में महर्षियां अज्ञात नहीं थे | इन सब विचारों के बावजूद भी महर्षियां अहिंसा के बारे में ऐसा अभिप्राय रखते हैं? – हमें समझना है कि, इस के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक सोच  छुपा हुआ है |

एक हिंसा दूसरी हिंसा का कारण बनता है | जैसे कि, एक आदमी एक जानवर को अगर मार देता है | आगे जा कर, वह ही जानवर एक आदमी का जन्म लेती है | और वह आदमी एक जानवर का जन्म लेता है | हमारे शास्त्र कहते हैं कि पिछले जन्म में जिस हिंसा का शिकार वह जानवर बना था, इस जन्म में वही जानवर, एक आदमी का जन्म लेकर, उस ही जीव पर वही हिंसा करेगी | इसके अतिरिक्त, वह हिंसाका कार्य, वातावरण में अनपेक्षित भय की तरंग को सृष्टि करता हैं | वह हिंसित जानवर जो संकट का अनुभव करता है– उससे ही यह तरंग उत्पत्ति होती हैं |  जिससे वह मनुष्य के मन में भी एक लहर प्रकट होता है | यह अनुभव सिर्फ एक क्षण भर होकर भी, उस मनुष्य के शांति के ऊपर असर पड़ता है | इसके कारण, उसके मन में शांति और सुख के अनुभव कुछ समय के लिए लुप्त हो जाति हैं | इसी लिए योग शास्त्र का यह कहना है कि जो लोग ध्यान की अभ्यास रखते हैं उन्हें जितना संभव हो सके, उतना हिंसा को छोड़ देना ही उचित है |

हमने पहले यह देखा कि हिंसा के माध्यम से ही आहार मिलता हैं | परन्तु, जितना आवश्यक हो उतना आहार पाने के लिए, अगर हिंसा करें तो उससे ज्यादा दुष्परिणाम नहीं होता | फिर भी, हो सके तोह ऐसा आहार चुनें जिसके लिए कम से कम हिंसा की आवश्यकता हो- ऐसा जानकार लोगों की राय हैं | इस के अलावा, आहार में यह दोष की उपस्थिति के कारण से ही- आहार का सेवन करने से पहले उसे  भगवान को अर्पित करते हुए, भगवान के स्मरण के साथ, उस आहार को प्रसाद की रूप में स्वीकार करने की रिवाज़ है | इस तरह, कुल मिलाकर, आहार के माध्यम से पाप जमा होता हैं | इसीलिए,  उदरभरण  के लिऎ जितनाअव्श्यक हॊ, उतना ही आहार सेवन करने का नियम बनाया गया है | आहार जीव के प्रतिरूप हैं- वह अगर प्राणी के मांस रूप में हो या पौधे या अनाज के रूप में हो |

और भी, जब एक आत्मज्ञानी आहार का सेवन करता हैं, उस आहार को सीधा भगवान को समर्पित करता है | ऐसे करने से, उस आहार के सम्बंधित सभी जीवों को सद्गति प्राप्त होति  हैं- ऐसे योगीजनों का कहना हैं | इसलिए, इस कार्य में हिंसा का कोई दोष नहीं है |


सूचन : इस लेख का कन्नड़ संस्करण AYVM   ब्लॉग पर देखा जा सकता है I


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